माया-जोगी जुगलबंदी
October 2, 2018 • Bishan Gupta

छत्तीसगढ़ में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर मायावती की बहुजन समाज पार्टी और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस के बीच चुनावी गठबंधन हो गया है। गठबंधन के तहत कुल 90 विधानसभा सीटों में 55 पर जोगी की जनता कांग्रेस और 35 सीटों पर बसपा चुनाव लड़ेगी। साथ ही अगर गठबंधन सत्ता में आता है, तो अजीत जोगी ही राज्य के मुख्यमंत्री बनेंगे। लखनऊ में दोनों दलों के बीच सीटों का ऐलान हुआ। पहले चर्चा थी, कि बसपा राज्य में कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी, लेकिन मायावती ने अचानक लिये फैसले से कांग्रेस को तगड़ा झटका दिया है। कांग्रेस को उम्मीद थी कि कि वो छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में में बसपा से गठबंधन करके इन राज्यों में भाजपा की सरकारों को उखाड़ फेंकेगी। लेकिन माया ने अपने इस फैसले से ना केवल कांग्रेस बल्कि सपा को भी यह बताने की कोशिश की है, कि वो सीट समझौते में कमजोर नहीं पड़ेगी। छत्तीसगढ़ में पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस को महज 1 फ़ीसदी वोटों के अन्तर से हराया था, जबकि उस चुनाव में बसपा को करीब 4.4 फ़ीसदी वोट मिले थे। हालाकि बसपा ने सभी 90 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे, लेकिन वो केवल जैजैपुर विधनासभा सीट ही जीत पाई थी, जबकि पांच सीटों पर उसे करीब 20 फ़ीसदी वोट मिले थे। राज्य में कुल 90 विधानसभा, 11 लोकसभा की सीटें हैं। छत्तीसगढ़ में कुल 27 जिले हैं। राज्य विधानसभा में 51 सीटें सामान्य, 10 सीटें एससी और 29 सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से राज्य में कांग्रेस और भाजपा के बीच दोतरफ़ा मुकाबला ही होता रहा है। लेकिन साल 2016 में पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने कांग्रेस छोड़ दी और जनता कांग्रेस के नाम से अलग पार्टी का गठन कर लिया। इसके बाद से उम्मीद जताई जा रही थी कि इस बार राज्य में लोकसभा और विधानसभा चुनाव में त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिलेगा। हालांकि छत्तीसगढ़ कांग्रेस के नेता अजीत जोगी को राज्य की राजनीति में चुका हुआ खिलाड़ी मानते रहे है। लेकिन राजनीति के चतुर खिलाड़ी अजीत जोगी ने बसपा से गठबंधन करके ना केवल कांग्रेस को तगड़ा झटका दिया है, बल्कि राज्य की राजनीति में खुद को एक गंभीर ख़िलाड़ी के रूप में पेश किया है। अजीत जोगी का मानना है कि राज्य में अब तक तीसरा विकल्प मौजूद नहीं था और लोग ना चाहते हुए भी कभी भाजपा, तो कभी कांग्रेस को वोट देते थे। लेकिन अब उन्हें तीसरा विकल्प मिल गया है और भाजपा -कांग्रेस की राजनीति को नापसंद करने वाले लोग उन्हें वोट करेंगे। अजीत जोगी को यह भी अहसास है कि अगर राज्य में जोगी को यह भी अहसास है कि अगर राज्य में त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बनती है, तो वो । भी मुख्यमंत्री बन सकते हैं। उधर मायावती और जोगी के बीच हुए इस गठबंधन से भाजपा खुश है। पार्टी नेताओं को लगता है कि इससे कांग्रेस को ही नुकसान होगा, क्योंकि माया की जहां एससी वोटों पर पकड़ है, तो वहीं अजीत जोगी की एसटी मतदाताओं के एक वर्ग पर अच्छी पकड़ है। भाजपा के खिलाफ़ यह वर्ग अब तक कांग्रेस को वोट करता आया है, लेकिन अगर उसे माथा-जोगी की पार्टी की बीच गठबंधन के रुप में मजबूत विकल्प मिलेगा, तो वो कांग्रेस के बजाय उसे ही वोट देना पसंद करेगा। इसका सीधा फ़ायदा भाजपा को होगा। वहीं कांग्रेस के कई नेता राज्य में बसपा से गठबंधन ना होने के लिए राज्य के प्रभारी पीएल पूनिया को कोस रहे हैं। उनका कहना है कि पूनिया का मायावती के साथ छत्तीस का आंकड़ा है। दोनों ही दलित नेता हैं और उत्तर प्रदेश की राजनीति में दोनों एक दूसरे के धुर विरोधी रहे हैं। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि राज्य में बसपा-कांग्रेस गठबंधन ना होने की एक वजह उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी भी हैं। नसीमुद्दीन सिद्दीकी को जब मायावती ने बसपा से निकाला, तो नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने माथा पर टिकट बेचने का आरोप लगाया था। साथ ही प्रेस कांफ्रेंस करके माया की ऑडियो टेप भी जारी की थी, जिससे मायावती की खासी किरकिरी हुई थी। लेकिन पीएल पुनिया के इशारे पर कांग्रेस पार्टी में नसीमुद्दीन की एंट्री हो गयी, जिससे मायावती पूनिया से ख़ासी नाराज थी । इसके साथ ही सूत्रों का यह भी दावा है कि कांग्रेस की छत्तीसगढ़ इकाई राज्य में बसपा से गठबंधन करने के खिलाफ़ थी, क्योंकि 2013 के विधनसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के बीच मात्र एक फ़ीसदी वोटों का अन्तर था, जबकि इस बार राज्य की भाजपा सरकार के खिलाफ़ एंटी एन्कम्बेंसी भी है। ऐसे में पार्टी थोड़ी सी मेहनत करके ही रमन सिंह सरकार को उखाड़कर फेंक सकती है। अगर राज्य में बसपा मजबूत होती है, तो आगे चलकर वो कांग्रेस के ही वोट बैंक में सेंध लगाएगी, जैसा की उत्तर प्रदेश में हुआ था। राज्य इकाई के नेताओं का कहना है कि रूट लेवल के कार्यकर्ता बसपा से गठबंधन पर सहमत नहीं थे। उसकी वजह साफ़ है कि राज्य में बसपा कोई फ़ैक्टर ही नहीं है। चुनाव दर चुनाव उसका वोट बैंक सिमट रहा है। 2008 के विधानसभा चुनाव मे जहां बसपा को 6.11 फ़ीसदी वोट मिला और दो विधायक बने, तो वहीं 2013 के चुनाव में बसपा को मात्र 4.4 फ़ीसदी वोट मिले और उसका केवल एक विधायक ही बन सका ।।