हिन्दी पर बवाल
September 21, 2019 • Bishan Gupta

रिपोर्ट -सतीश कौशिक 

गृह मंत्री अमित शाह के एक देश, एक भाषा के बयान पर सियासी घमासान मच गया है। अमित शाह ने ट्वीट के जरिए कहा था कि भारत विविध भाषाओं का देश है और हर भाषा का अपना अलग महत्व है। लेकिन पूरे देश की एक भाषा होनी चाहिए, जो दुनिया भर में भारत की पहचान बन सके । यह काम हिन्दी बखूबी कर सकती है। आज देश को एकता की डोर में बांधने का काम अगर कोई भाषा कर सकती है, तो वो देश में सर्वाधिक बोली जाने वाली हिन्दी भाषा है, इसलिए मैं देशवासियों से अपील करता हूं कि वो अपनी-अपनी मातृ भाषा के प्रयोग को बढ़ाएं, लेकिन साथ में हिन्दी का भी प्रयोग करें और देश की एक भाषा के बापू और पटेल के सपने को साकार करने में योगदान दें। इसके साथ ही शाह ने अपने ट्वीट में यह भी कहा कि आजादी के आन्दोलन में हिन्दी भाषा का बड़ा रोल है। अगर आन्दोलन से हिन्दी को निकाल दें, तो आन्दोलन का अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। हमारे पुरखों ने देश की एक भाषा को ध्यान में रखकर ही राजभाषा की कल्पना की थी और राजभाषा के रूप में हिन्दी को स्वीकार किया था गृह मंत्री ने अपने एक अन्य ट्वीट में कहा कि हमारे देश की सभी भाषाओं की व्यापकता और समृद्धता विश्व की किसी भी भाषा से अधिक है । मैं देशवासियों से आह्वान करता हूं कि आप अपने बच्चों से, सहकर्मियों से अपनी भाषा में बात कीजिये, क्योंकि अगर हम ही अपनी भाषा छोड़ देंगे, तो उन्हें लम्बे समय तक जीवित कैसे रखा जाएगा।अमित शाह का इतना कहना था कि उनके बयान के विरोध में आवाजें उठनी शुरू हो गयीं।असदुद्दीन ओवेसी से लेकर ममता बनर्जी, कमल हसन से लेकर एम.के. स्टालिन तक ने शाह के बयान की आलोचना शुरू कर दी। उधर कांग्रेस ने इस मुद्दे की नजाकत को समझते हुए सधा हुआ बयान दिया है। कांग्रेस ने कहा है कि हिन्दी को बढ़ावा तो मिलना चाहिए, लेकिन इस बात का ध्यान भी रखा जाना चाहिए कि इससे क्षेत्रीय भाषाओं की स्वीकार्यता  बनी रहे। शाह के बयान का विरोध करते हुए एआईएमआईएम के चीफ असदुद्दीन ओवेसी ने कहा है कि हिन्दुस्तान हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुत्व से कहीं बड़ा है। हिन्दी हर भारतीय की मात भाषा नहीं है। उन्होंने कहा कि क्या आप विभिन्न मातृभाषाओं की विभिन्नता और सुन्दरता की तारीफ़ कर सकते हैं? इसके साथ ही उन्होंने कहा कि देश के संविधान का अनुच्छेद 29 हर भारतीय को उसकी भाषा और संस्कृति का अधिकार प्रदान करता है । गृह मंत्री के बयान पर बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का भी ट्वीट आया । उन्होंने जहां हिन्दी दिवस के मौके पर सभी देशवासियों को बधाई दी, तो वहीं कहा कि हमें सभी भाषाओं संस्कृतियों का समान रूप से सम्मान करना चाहिए हम कई भाषाएं सीख सकते हैं, लेकिन हमें अपनी मातृ भाषा को कभी नहीं भूलना चाहिए।अमित शाह के हिन्दी पर दिये गये बयान पर दक्षिण भारत में सबसे अधिक विरोध के स्वर उठ रहे हैं। इसको लेकर कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन भी हुए हैं । इस मुद्दे पर कुछ नेताओं ने तो अमित शाह से अपने बायान को वापस लेने और उस पर माफी मांगने तक की मांग की है_ भाषा को लेकर तमिलनाडु सबसे संवेदनशील राज्यों में से एक माना जाता है । यही कारण है कि हिन्दी पर जैसे ही गृह मंत्री अमित शाह का ट्वीट आया, तो उनके बयान पर विरोध को लेकर राज्य के नेताओं में मानो होड़ सी लग गयी। राज्य के सभी नेताओं को लगा, कि उन्हें अपनी राजनीति करने का इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा। फ़िर क्या था, अमित शाह के बयान के विरोध में प्रतिक्रियाएं आने लगी और आन्दोलन तक की धमकी दी जाने लगी। डीएमके अध्यक्ष एमके स्टालिन ने अमित शाह के बयान पर विरोध जताते हुए कहा है कि गृह मंत्री के बयान से हमें आघात पहुंचा है। हिन्दी को थोपे जाने का हम हमेशा से विरोध करते रहे हैं और आगे भी करते रहेंगेउनका एक देश, एक भाषा संबंधी बयान देश की एकता, विविधता के लिए खतरा है। उधर अभिनेता से नेता बने कमल हसन भी कहां पीछे रहने वाले थे। उन्होंने एक देश, एक भाषा वाले अमित शाह के बयान पर पर कहा कि भारत 1950 में इस वादे के साथ गणतंत्र बना, कि इसकी भाषा और संस्कृति संरक्षित रखी जाएगी। कोई शाह, सुल्तान या सम्माट उस वादे को नहीं तोड़ सकता हम सभी भाषाओं का सम्मान करते हैं, लेकिन हमारी मातृ भाषा हमेशा तमिल रहेगीउन्होंने कहा जलीकटू मात्र विरोध प्रदर्शन था । हमारी भाषा के लिए जंग उससे भी बड़ी होगी। उधर जाने माने अभिनेता रजनीकांत ने अमित शाह के हिंदी पर दिए बयान पर कहा कि पूरे भारत में एक ही भाषा की की संकल्पना संभव नहीं है और हिंदी को थोपे जाने की हर कोशिश का केवल दक्षिणी राज्य ही नहीं बल्कि उत्तर भारत में भी कई लोग विरोध करेंगे। अमित शाह के बयान पर कर्नाटक में भी सियासी पारा चढ़ गया है। कर्नाटक दक्षिण भारत का अकेला राज्य हैं, जहां भाजपा सत्ता में है, लेकिन राज्य की सियासी नब्ज को पहचानते हुए राज्य के भाजपाई मुख्यमंत्री बीएस येदुरप्पा ने भी राज्य की राजनीति के हिसाब से ही बयान दिया है, अब वो चाहें पार्टी के स्टैण्ड से मेल ना खाता हो। येदुरप्पा ने कहा है कि हमारे देश में सभी अधिकारिक भाषाएं समान हैं, हालांकि जहां तक कर्नाटक का सवाल है, कन्नड़ यहां की प्रमुख भाषा है। हम कभी भी इसके महत्व से समझौता नहीं करेंगे। हम कन्नड़ भाषा और यहां की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। दूसरे दक्षिणी राज्यों में भी हिन्दी को लेकर अमित शाह के बयान पर बवाल मचा है। केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने कहा कि अमित शाह ने जानबूझकर इस मुद्दे को उठाया है, ताकि अहम मुद्दों से जनता का ध्यान बंटाया जा सके, तो वहीं पुडुचेरी के मुख्यमंत्री वी नारायण स्वामी ने कहा कि लोगों पर हिन्दी थोपने से भारत की सांस्कृतिक पहचान पर चोट पहुंचेगी। मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में हिन्दी भाषा को लेकर यह पहला विवाद नहीं है । इससे पहले केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय के एक फ़ैसले ने दक्षिणभाषी राज्यों में खलबली मचा दी थी। दरअसल शिक्षा नीति के ड्राफ्ट में दक्षिण के राज्यों के लिए तीन भाषा फ़ार्मूला के तहत हिन्दी भाषा को अनिवार्य किया गया था, जिसके बाद काफ़ी बवाल मचा। हालांकि विरोध के बाद सरकार बैकफुट पर आ गयी और ड्राफ्ट में बदलाव कर दिया गया और गैर हिन्दी राज्यों में हिन्दी को अनिवार्य करने की शर्त को हटा लिया गया