21वीं सदी के समाजसुधारक जगतगुरू स्वामी योगेश्वराचार्याजी महाराज
August 21, 2019 • Bishan Gupta

अरे सुधारक जगत के, मत जगत सुधार। दिल ही तेरा जगत है, तू पहले इसे सुधार ।। यह कहना है जगतगुरू रामानुजाचार्या स्वामी श्री योगेश्वराचार्या जी महाराज का, जिन्होंने अपना पूरा जीवन समाज को अर्पित कर दिया है। वो उन विरले संतों में से एक हैं, जो महान संत जगतगुरु स्वामी रामनुजाचार्या की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए समाज को नई दिशा देने में जुटे हैं । इसी के चलते उन्हें जगतगुरू रामनुजाचार्या जी की गद्दी का उत्तराधिकारी चुना गया है।

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में पिता पंडित नन्दलाल मिश्रा व माता उमरावती के घर जन्म लेने वाले स्वामी योगेश्वराचार्या जी का गांव घुईसर सरयू नदी के किनारे बसा है। यह वही स्थान है, जहां से भगवान श्री राम ने वन के लिए प्रस्थान किया था। महाराजश्री का बचपन यहीं बीता और समाज को नई दिशा देने के उद्देश्य से वो सन्यासी हो गये। इसके बाद महाराज श्री ने स्वामी राघवाचार्या जी महाराज,  अयोध्याधाम व परमानन्द महाराज महामंडलेश्वर से ज्ञान प्राप्त किया और जुट गये समाज को नई दिशा देने में। वर्तमान समय में वो ज्ञान वर्षा के साथ ही सेवा भी करते हैं । वो जहां अपने गुरुकुल में बच्चों को शिक्षा देते हैं, तो वहीं । समय-समय पर गरीबों को अन्न वस्त्र भी बांटते हैं, गरीब कन्याओं की शादी भी करवाते हैं। महाराजश्री का मानना है कि पेड़-पौधे ही हमें जीवन देते हैं, इसलिए हर व्यक्ति को पेड़ लगाने चहिए। वो खुद भी वृक्षारोपण करते हैं। इसके साथ ही वो अपने यहां आने वाले हर व्यक्ति को एक पौधा देते हैं और उससे उसके पालन पोषण का प्रण करवाते हैं। स्वामी योगेश्वराचार्या जी महाराज लोगों से कहते हैं कि जीवन नित नया है, इसे भयभीत होकर ना जीयो। रोज जीयो, पल-पल जीयो । भूल करो, लेकिन बार-बार वही भूल ना करो। उस भूल से सीखने की कोशिश करो। क्योंकि भूल तो पीछे छूट जाएगी, लेकिन भूल से मिली सीख हमेशा तुम्हारे साथ रह जाएगी। इस पर महाराजजी दो पंक्तियां सुनाते हैं। जीवन में जो ना करेगा सीना आगे, पीठ उसे खींचेगी पीछे। जो ऊपर उठन सकेगा, उसे जाना पड़ेगा नीचे।। स्वामी योगेश्वराचार्या महाराज कहते हैं कि मनुष्य को हमेशा फूल की भांति प्रफुल्लित रहना चाहिए। जब इंसान दिल खोकर हंसता है, तो उसका रोम-रोम खिल जाता है। यह स्वभाविक है, कि जब इंसान का रोम-रोम आनन्दित होगा, तो मन अपने आप प्रफुल्लित हो जाएगा। जगतगुरू जी बताते हैं कि इंसान को हमेशा सक्रिय रहना चाहिए, क्योंकि सक्रिय इंसान के पास हमेशा समय होता है। जब व्यक्ति आलस का शिकार हो जाता है, तो वो किसी के लिए समय नहीं निकाल पाता। जगतगुरू योगेश्वराचार्याजी सीख देते हैं कि अगर आपको कुछ मांगना है, तो गुरूओं से मांगों, अपने माता-पिता से मांगों । इनके सामने ना तो कभी संकोच करो और ना ही कभी अहंकार करो, क्योंकि जो इंसान माता-पिता और गुरुओं के सामने अहंकार करेगा, वो कभी भी अहंकार नहीं छोड़ सकता। वो सतसंग का अर्थ समझाते हुए बताते हैं कि सतस्संग का अर्थ है श्रद्धा । साधू संगत का अर्थ है, सुविचार से संगत । अगर आप श्रद्धा भाव के साथ किसी सच्चे साधू का साथ पकड़ेंगे, तो आपका बेड़ा पार हो जाएगा।